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Tuesday, 25 December 2018

महाराजा सूरजमल सा वीर || The Plato of the Jat People || Know This Legend


Maharaja Suraj Mal (13 February 1707 – 25 December 1763) or Sujan Singh was ruler of Bharatpur in Rajasthan, India. A contemporary historian has described him as "the Plato of the Jat people" and by a modern writer as the "Jat Odysseus", because of his political sagacity, steady intellect and clear vision.


 "नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर, जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर" 

महाराजा सूरजमल त्याग ,बलिदान ,वीरता कि साक्षात्मूर्ति है । इसलिए उनके जन्म दिवस को शोर्य दिवस के रूप में मनाना चाहिए ।जब सम्पूर्ण भारत के राजा राज्य करने के लिए मुगलो को अपनी बहिन बेटी दे रहे थे । उस समय महाराज ने अपनी वीरता से अपने राज्य का न केवल विस्तार किया बल्कि मुगलो को अपने आगे घुटने टेक ने को मजबूर कर दिया । मुगलो से दिल्ली जीतने वाले एकमात्र हिन्दू राजा थे । उनके खौफ के कारन ही मुगलो ने अपने राज्य में पीपल के पेड़ को काटने और गाय कि हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था । सूरज सा दिलेर उस समय कोई नहीं था । महाराजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 को महारानी देवकी और महाराजा बदनसिंह के घर हुआ|
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  उनके जन्म के संबंध में जन मानस में एक लोकगीत प्रचलित है:
'आखा' गढ गोमुखी बाजी ।माँ भई देख मुख राजी ।।
धन्य धन्य गंगिया माजी ।जिन जायो सूरज मल गाजी ।।
भइयन को राख्यो राजी ।चाकी चहुं दिस नौबत बाजी ।।
भरतपुर इतिहास के अनुसार सूरजमल महाराजा बदन सिंह के ही पुत्र थे जब कि कुछ इतिहासकार उनको दत्तक पुत्र मानते है । महाराजा बदनसिंह के 26 पुत्र थे ऐसे में उनको किसी को गोद लेने कि क्या जररूत थी । सूरजमल कि माँ कामा कि जाटणी थी । बदनसिंह के 26 पुत्र निम्न थे :-- 
सूरजमल ,प्रतापसिंह ,अखैसिंह ,बलरामसिंह ,बिजयसिंह ,बीरनारायणसिंह ,दलेलसिंह ,दुल्हसिंह ,देवीसिंह ,गुमानसिंह, हिम्मतसिंह, जोधसिंह, कुशालसिंह, खेमकरणसिंह ,लालसिंह, मानसिंह, मेघसिंह, उदयसिंह, सुलतानसिंह , सुखरामसिंह , साकतसिंह , सभारामसिंह, रामकृष्ण सिंह, रामबलसिंह, रामप्रेमसिंह || 
महाराजा सूरजमल का वास्तविक नाम सुजानसिंह था । महाराजा सूरजमल के 14 रानियाँ और 5 लड़के थे| उनकी रानियों में किशोरी देवी , हसिया रानी। गौरी देवी , ख़त्तुदेवी कल्याणी देवी ,गंगा देवी मुख्य है , उनके पुत्र जवाहरसिंह , रणजीतसिंह , रतनसिंह , नाहरसिंह , नवलसिंह थे| अपनी वीरता के दम पर सूरजमल का राज्य पलवल , मेवात , गुडगाव , रोहतक , नीमराणा , मेरठ , बुलंदसहर , अलीगढ , एटा , इटावा , मैनपुरी मथुरा , हाथरस , फ़िरोज़ाबाद , आगरा तक फैला हुआ था । महाराजा सूरजमल ने अपने जीवन में बहुत से युद्ध लड़े और जीते युद्धो के दोरान दुश्मन को नरक का रास्ता उनकी तलवार ने दिखाया| चन्दौस का युद्ध 1746, बगरू का युद्ध 20 अगस्त 1748 को जयपुर रियासत के दो भाइयो के बीच था जहा माधो सिंह के साथ सम्पूर्ण राजपूत और मराठा शक्ति थी| वही ईश्वरसिंह के साथ जाट वीर सूरजमल थे सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार ले कर लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा तब सूर्यमल्ल मिश्रण ने जवाब दिया:
यह वीर लोहागढ़ का जाट वीर है और आगे का परिचय एक इसप्रकार दिया 
"नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर, जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर" 
इस युद्ध में सुरजमल ने सम्पूर्ण राजपूत शक्ति को एक साथ पराजित किया 1 जनवरी 1750 को मीर बक्शी ने सूरजमल से समझोता किया उनके राज्य में न पीपल कटा गयेगा नहीं गायहत्या होगी और न किसी मंदिर को नुकसान होगा 


 उस समय उनका खौफ था जो मुस्लिम इस बात को मानने के लिए मजबूर हुए जिसको आज तक कोई दूसरा भी नहीं मनवा पाया| घासेड़ा का युद्ध 1753 में हुआ दिल्ली विजय 10 मई 1753 दिल्ली के मुग़ल बादशाह के एक सुखपाल नामका ब्राह्मण काम करता था , एक दिन उसकी लड़की अपने पिता को खाना देने महल में चली गयी मुग़ल बादशाह उसके रूप पर मोहित हो गया । और ब्राह्मण से अपनी लड़की कि शादी उससे करने को कहा और बदले में उसको जागीरदार बनाने का लालच दिया ब्राह्मण मन गया और अपनी बेटी चन्दन कौर कि शादी मुग़ल बादशाह से कार को तैयार हो गया , जब चन्दन कौर ने यह बात सुनी तो उसने शादी से इंकार कर दिया क्रोधित बादशाह ने लड़की को जिन्दा जलाने का आदेश दिया , मौलवियो ने बादशाह से कहा ऐसा तो यह मर जायेगी । आप इस को जेल में डालकर कष्ट दो राजा मन गया और लड़की को जेल में डाल दिया , लड़की ने जेल कि जमादारनी से कुछ क्या इस देश में कोई ऐसा राजा नहीं है जो हिन्दू लड़की कि लाज बचा सखे? जमादारनी ने कहा ऐसा वीर तो सिर्फ है है लोहागढ़ नरेश| बेटी तू एक पत्र लिख में तेरी माँ को दे दुगी| लड़की के दुखो को देख वहाँ काम करनेवाली जमादारनी ने लड़की कि मदत कि उसने अपने काजल से एक पत्र लिखा और उसकी माँ पत्र ले कर सूरजमल से पास गयी| उसकी कहानी सुन सूरजमल ने अपने दूत वीरपाल गुर्जर को दिल्ली भेजा बादशाह ने गुर्जर कि हत्या का दी और मरते मरते दूत ने अपना संदेश लोहगढ़ भेज दिया कि मुग़ल बादशाह बोले कि तू मुझे जाटणी का ढोल दे दे| यह सुन महाराज सूरजमल गुर्रा के खेड़े हुए और दिल्ली पर जाटों ने चढाई कर दी| गोर गोर जाट चले अपनी लाड़ली सुसराल चले हाथो में तलवार लेकर मुगलो के बनने जमाई| जाटों ने दिल्ली घेरली और बादशाह ने महाराज के पैर पकड़ लिये और बोला मैं तो आपकि गाय हूँ मुझे छोड़ दो| 


 महाराजा आप कुछ दिन दिल्ली घूमो महाराज राज़ी हो गये धोखे से रुहेले मुस्लिमो ने सूरजमल को मार दिया| जब यह खबर बादशाह के पासपहुची तो वो बोला जाट को मारा जब जानिए जब 13 वि हो जाये| सैना वापिस लोट गयी| रानी किशोरी ने जवाहर सिंह को सन्देश भेजा| बाद में जवाहर वीरने दिल्ली जीती और मुगलो कि ताकत को नष्ट कर दिया| अपने राजगुरु के कहने पर दिल्ली कि गद्दी पर नहीं बैठे क्योंकी उनका मनना था इस गद्दी से बहुत अत्याचार हुए है. 

 पूरा जाट समाज राजनीतिक दासता मे जकड़ा हुआ है। एसे मे मुझे नहीँ लगता कि कोई भी जाटोँ को लोकतांत्रि
कहेगा।
पर मैँ इतना जरूर कहना चांहूगा कि जिस जाट जाति का इतिहास इतना गौरवशाली रहा है उसको धूमिल ना होने दे।
ताश को छोड अपने समाज के बारे मे सोचे।
हमेँ नया इतिहास लिखना है। सर छोटूराम,चौ. चरण सिँह जैसे नेता बनाने है।
जाटोँ मे प्रतिभा की कोई कमी नहीँ है प राजनीतिक दासता छोड़ना होगा।
इन परिवारोँ के पीछे भागने से कुछ नहीँ होगा।
आखिर मे मैँ बस इतना कहूगा कि मेरे युवा जाट भाईयोँ जागोँ।
हम जाट है, और जाट कुछ भी कर सकता है। जिस प्रकार राजा जवाहर सिँह ने कम उम्र मेँ अपने
पहले अभियान मे दिल्ली को रौँद दिया था उसी प्रकार से हमे भी अपनी नेतृत्व शक्ति को पहचानते हुए
नया इतिहास रचना है।

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