आजादी की जंग चल रही है।
Helpul Farmer Story
यह जो दिमाग है न, कभी-कभी बड़े मजेदार विचार उत्पन्न कर देता है। गुनगुनी धूप में आँखें बंद किए बैठा था और विचार आया कि अगर मेरा समय थोड़ा पीछे जाने लगे तो क्या दृश्य दिखेंगे? मैं क्या होऊंगा उस समय?
देश को आजादी मिली है और मैं दिल्ली की किसी शरणार्थी बस्ती में शारीरिक और मानसिक दर्द से बिलखते, टूट चुके लोगों के बीच टहल रहा हूँ। मुझे एक टेंट में कई मासूम दिखे जिनके माँ-बाप का कोई पता नहीं है। कुछ मर्द-औरत आकर उनमें अपना बच्चा खोजते हैं। जिन्हें बच्चे मिल जाते हैं उनका वो हँसते हुए रोना देखा नहीं जाता। और जिनके बच्चे नहीं मिलते, उनका चुपचाप किसी और टेंट की ओर बढ़ जाना खुद की आँखें गीली कर जाता है। मुझे बहुत गुस्सा आता है और पंजाब की ओर जाती भीड़ से बदला लेने के लिए मैं हथियार लेकर उनमें घुस जाता हूँ। पर वहाँ भी मैं कुछ नहीं कर पाता। वहाँ भी हूबहू वही सूरतें, मनहूसियत दिखाई देती है।
आजादी की जंग चल रही है। मैं क्या हूँ? गाँधी की अहिंसक-आर्मी का खद्दरधारी सिपाही जो विदेशी कपड़ों की दुकानों के आगे पिकेटिंग कर रहा है, या दांडी यात्रा में तेज कदमों से बढ़ा चला आ रहा है? या आजाद की एचएसआरए का सिपाही है जो जगह-जगह क्रांति की अलख जगाने के लिए वीर भगत के पेम्पलेट बाँट रहा है, या वह गद्दार जिसने उन सबके खिलाफ गवाही दी थी? या शायद आजाद हिंद फौज का सिपाही, जो नॉर्थ-ईस्ट के मोर्चे पर गुमनाम मौत मर गया?
वो देखो 1857 की क्राँति हो रही है और मैं यूपी का एक उज्जड सैनिक हूँ जिसने अपने साथियों के साथ दिल्ली में घुसकर चुन-चुनकर अंग्रेजों को जिबह कर डाला। या वो अंग्रेज मैं ही हूँ जिसने वापस दिल्ली फतह करने के बाद वो बदला लिया कि इंसानियत हजार मौत मरी।
बादशाद औरंगजेब काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वा रहा है और मैं भयभीत चूहे के तरह दुम दबाकर अपने महादेव के पावन मंदिर को टूटता और उसकी जगह मस्जिद बनता देख रहा हूँ। आगरे का ताजमहल बन रहा है और मैं एक मजदूर हूँ जो पत्थर ढो रहा है। अकबर ने राजपूताने में राजपूतों को हराने के लिए राजपूतों की सेना भेजी है। मैं एक राजपूत हूँ और जाने किस तरफ से तलवार चला रहा हूँ। बनारस के अस्सीघाट पर बाबा तुलसीदास अपनी रामायण सुना रहे हैं और मैं उन्हें परेशान करने वाले बनारसियों में शामिल हूँ, या मैं उनकी वह सेना हूँ जिसने उन्हें कैद करने वाले प्रशासन के सभी सैनिकों को एक रात में हरा कर तुलसी को मुक्त कर लिया था। पंजाब का खालसा या महाराष्ट्र का मराठा भी मैं ही हूँ।
लोधी, सैयद, तुगलक, खिलजी, गुलाम वंश के शासनकाल के दौरान पिसता-छटपटाता हिन्दू हूँ, या शायद हिंदुत्व छोड़ धर्मांतरित मुस्लिम हूँ जो बलात धर्मांतरण की मुहीम में शामिल है।
चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य का वह श्रेष्ठ समय। किसी व्यापारी का एक छोटा सा कर्मचारी जो दूर देश की यात्रा करता है। या धूल उड़ाती सड़कों पर शाम के वक्त मसक से पानी छिड़कता एक राजकीय कर्मचारी।
जाने कहाँ तक पीछे-पीछे बढ़ता गया हूँ। मैंने भीम और अर्जुन को युद्ध करते देखा है। कृष्ण की बाँसुरी सुनी है। वानरों की सेना के साथ समुद्र पर पत्थरों का पुल बनाया है। मैंने राम को अपनी स्त्री के वियोग में रोते देखा है। देवर्षि नारद का आशीर्वाद लिया है। इंद्र और वरुण की तपस्या की है। इस यात्रा की अंतिम याद मुझे यह है कि किसी वन में एक पेड़ के नीचे मैं लकड़ी काटकर सुस्ता रहा हूँ और पास में ही किसी आश्रम से वेदाभ्यास के स्वर कानों के रास्ते मेरे मष्तिष्क में प्रविष्ट हो रहे हैं।
आजादी की जंग चल रही है। मैं क्या हूँ? गाँधी की अहिंसक-आर्मी का खद्दरधारी सिपाही जो विदेशी कपड़ों की दुकानों के आगे पिकेटिंग कर रहा है, या दांडी यात्रा में तेज कदमों से बढ़ा चला आ रहा है? या आजाद की एचएसआरए का सिपाही है जो जगह-जगह क्रांति की अलख जगाने के लिए वीर भगत के पेम्पलेट बाँट रहा है, या वह गद्दार जिसने उन सबके खिलाफ गवाही दी थी? या शायद आजाद हिंद फौज का सिपाही, जो नॉर्थ-ईस्ट के मोर्चे पर गुमनाम मौत मर गया?
वो देखो 1857 की क्राँति हो रही है और मैं यूपी का एक उज्जड सैनिक हूँ जिसने अपने साथियों के साथ दिल्ली में घुसकर चुन-चुनकर अंग्रेजों को जिबह कर डाला। या वो अंग्रेज मैं ही हूँ जिसने वापस दिल्ली फतह करने के बाद वो बदला लिया कि इंसानियत हजार मौत मरी।
बादशाद औरंगजेब काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वा रहा है और मैं भयभीत चूहे के तरह दुम दबाकर अपने महादेव के पावन मंदिर को टूटता और उसकी जगह मस्जिद बनता देख रहा हूँ। आगरे का ताजमहल बन रहा है और मैं एक मजदूर हूँ जो पत्थर ढो रहा है। अकबर ने राजपूताने में राजपूतों को हराने के लिए राजपूतों की सेना भेजी है। मैं एक राजपूत हूँ और जाने किस तरफ से तलवार चला रहा हूँ। बनारस के अस्सीघाट पर बाबा तुलसीदास अपनी रामायण सुना रहे हैं और मैं उन्हें परेशान करने वाले बनारसियों में शामिल हूँ, या मैं उनकी वह सेना हूँ जिसने उन्हें कैद करने वाले प्रशासन के सभी सैनिकों को एक रात में हरा कर तुलसी को मुक्त कर लिया था। पंजाब का खालसा या महाराष्ट्र का मराठा भी मैं ही हूँ।
लोधी, सैयद, तुगलक, खिलजी, गुलाम वंश के शासनकाल के दौरान पिसता-छटपटाता हिन्दू हूँ, या शायद हिंदुत्व छोड़ धर्मांतरित मुस्लिम हूँ जो बलात धर्मांतरण की मुहीम में शामिल है।
चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य का वह श्रेष्ठ समय। किसी व्यापारी का एक छोटा सा कर्मचारी जो दूर देश की यात्रा करता है। या धूल उड़ाती सड़कों पर शाम के वक्त मसक से पानी छिड़कता एक राजकीय कर्मचारी।
जाने कहाँ तक पीछे-पीछे बढ़ता गया हूँ। मैंने भीम और अर्जुन को युद्ध करते देखा है। कृष्ण की बाँसुरी सुनी है। वानरों की सेना के साथ समुद्र पर पत्थरों का पुल बनाया है। मैंने राम को अपनी स्त्री के वियोग में रोते देखा है। देवर्षि नारद का आशीर्वाद लिया है। इंद्र और वरुण की तपस्या की है। इस यात्रा की अंतिम याद मुझे यह है कि किसी वन में एक पेड़ के नीचे मैं लकड़ी काटकर सुस्ता रहा हूँ और पास में ही किसी आश्रम से वेदाभ्यास के स्वर कानों के रास्ते मेरे मष्तिष्क में प्रविष्ट हो रहे हैं।
साभार उपकार : चीकू चौधरी महामंत्री ।।




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